97. सिला क्यों नहीं देते

 

 

देना है तो इस तरह दुआ क्यों नहीं देते

हर रोज़ की उलझन को मिटा क्यों नहीं देते

 

दीदार की खातिर ही चले आए हो लेकिन

जलवों को निगाहों में बसा क्यों नहीं देते

 

मैं दार-ए-रसन तूर पे हरजा तुम्हें ढूंढा

रहते कहाँ उसका पता क्यों नहीं देते

 

ग़फ़लत में फंसा देता है ये नफ़्स किसी दिन

इस नफ़्स के क़तरों को मिटा क्यों नहीं देते

 

बातिन मेरा एक आईना बन जाए हमेशा

ज़ाहिर को मेरे दिल से हटा क्यों नहीं देते

 

कब तक मैं तड़पता रहूं इस हिज्र में जाना

तुम अपने ही दामन की हवा क्यों नहीं देते

 

तहरीर यही हो तो तावीज़ बना लो

कोई लफ़्ज़ ग़लत हो तो मिटा क्यों नहीं देते

 

एक हश्र मचा दे न किसी रोज़ ये दावर

तुम मेरी वफ़ाओं का सिला क्यों नहीं देते

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