रुबाई
भुलाया है जिसे दिल ने उसे फिर याद न करना
अदद-ए-दुश्मन दिल को कभी भी शाद न करना
खुशी से ज़हर पी लेना मगर फ़रियाद न करना
बड़ी दौलत है खुदादी उसे बर्बाद न करना
छीन कर के कोई मेरी खुदारियां भीख का देने वाला नहीं चाहिए
जिस शमा में जले तेल खैरात का वो शमा उजाला नहीं चाहिए
रूखी सूखी ही खा कर गुज़ारा करूं ऐश-ओ-इशरत की मुझको ज़रूरत नहीं
जिस निवाले में फ़ैज़ हिदायत नहीं उस तरह का निवाला नहीं चाहिए
रोज़ी रोटी का ज़ामिन है मेरा खुदा सारी ख़ल्क़त का रज़ाक मेरा खुदा
जायज़ा एक लुक्मा ही काफ़ी मुझे ये नाजायज़ निवाला नहीं चाहिए
ऐ खुदा तुझ से बस है यही इल्तिजा वक्त आख़िर किसी का न आज़िर बना
मुझको दुनिया में हरगिज़ न बदनाम कर नाम बदकार वाला नहीं चाहिए
ऐ खुदा मुझको इंसान ऐसा बना तेरे बंदों को बख्शूं मैं सदक़ा तेरा
मैं दिखा दूंगा उन सब को जलवा तेरा अब कोई धर्मशाला नहीं चाहिए
माल-ओ-दौलत की मुझको ज़रूरत नहीं शाही महलों की भी मुझको हाजत नहीं
मैं हमेशा रहूं तेरे दर का गद नाम वो बोल बाला नहीं चाहिए
ऐ खुदा तेरे दावर की है इल्तिजा नूर शमा हिदायत तू दिल में जला
रोशनी इतनी काफ़ी है मेरे लिए ग़ैर घर का उजाला नहीं चाहिए