94. खुदरत का तमाशा

 

 

अना  में झाँककर देखो कि क्या क्या उसके अंदर है

हमारा खालिक और मालिक कहाँ अपने से बाहर है

 

हमारे दिल के अंदर है अज़ल से दिलबर जाना

कोई बाहर उसे समझे यकीनन वही काफ़िर है

 

निगाहों के दरिचों से वो दिल में आ गया होगा

नफ़ख़्तु फ़ी मिन रूही से मतलब साफ़ ज़ाहिर है

 

इसी हस्ती में है लोह क़लम भी अर्श और कुर्सी भी

वो खुद आदमी में पोशीदा वहदत का सागर है

 

इसी हस्ती में सब कुछ देखते आरिफ़ कामिल

उन्हीं से पूछ लो हस्ती के अंदर क्या क्या मंज़र है

 

मक़ाम-ए-मौत-ए-सर्मद से भी आगे हू का है मैदान

अहद अहमद जिसे कहते हैं सजदे वो दावर है

 

वजूद-ए-आदमी में देखे हैं सैंकड़ों आलम

ये कुल आलम का आका पोशीदा इन्सान के अंदर है

 

शरफ़ इन्सान को बख़्श ख़ुदा ने इस लिए दावर

ख़ुदा की सारी खुदरत का तमाशा उसके अंदर

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