93. न मुझको पिलाना सवेरे सवेरे

 

 

जो शब भर है सोया भुला कर के खुद को है उसको उठाने सवेरे सवेरे

मैं सोया नहीं रात भर ऐ मुअज़्ज़िन मुझे न जगाना सवेरे सवेरे

 

मेरा दिल है मस्जिद में हूँ घर ख़ुदा का मैं ख़ादिम हूँ ज़ाहिद रसूल-ए-ख़ुदा का

जो देखे नहीं ख़ुदा और नबी को तो उनको दिखाना सवेरे सवेरे

 

अज़ल से ही साजिद मैं बंदा ख़ुदा का सर अर्श कलमा पढ़ा मुस्तफ़ा का

मुझे न सिखा तू इबादत ख़ुदा की किसी को ठिकाना सवेरे सवेरे

 

न सोया ख़ुदा न सोए मुहम्मद मगर उनका हो कर तू क्यों सोगया है

जो सोया वो खोया जो जागा वो पाया ये सब को सुनाना सवेरे सवेरे

 

परस्तिश ख़ुदा के सिवा जो हैं करते कुफ्र कर के रब से जो काफ़िर हैं हरदम

ज़रूरी है दावत-ए-इस्लाम उन पर तो उनको सिखाना सवेरे सवेरे

 

मैं मयकश बला का नशे में हूँ हरदम शराब-ए-तहूरा की मस्ती है मुझ में

मैं प्यासा नहीं हूँ ख़ुदा के फ़ज़ल से न मुझको पिलाना सवेरे सवेरे

 

जिया भी ख़िलाफ़-ए-रिया से है दावर अगर मर गया तो लहद में कहूँगा

मैं था पारसा बन के दुनिया में ज़िंदा मुझे न सताना सवेरे सवेरे

-+=
Scroll to Top