वो मुझ में बोलता है मैं नहीं हूँ
ज़ुबान वो खोलता है मैं नहीं हूँ
उसी के हाथ है मीज़ान सब का
वो सब कुछ तोलता है मैं नहीं हूँ
बग़ैर अज़ हुक्म उस के कुछ न होगा
वो सब कुछ बोलता है मैं नहीं हूँ
जवाहिर है वही जोहर खरीदा
वो गोहर मोलता है मैं नहीं हूँ
सभी के दिल में उसकी है हुकूमत
वो दिल में डोलता है मैं नहीं हूँ
वो करता सैर है कुल आलमों की
वही तो डोलता है मैं नहीं हूँ
चुना दावर को वो खिदमत के खातिर
सभी वो रोलता है मैं नहीं हूँ