जो रुख पर एक नुक्ता है जिसे सब तिल समझते हैं!
मगर हम तो उसे कुरआन का हासिल समझते हैं!!
वो हर एक बात पर नाराज होते हैं सरे महफिल!
गनीमत है के वो हम को किसी काबिल समझते है!!
हमे परवा नहीं है नाखुदाओं की तलातुम् में!
जहाँ तूफान उठता है वहीं साहिल समझते हैं!!
नजर आता नहीं कोई जो अपने आप को समझे!
जनाबे इश्क हर एक चीज को महमिल समझते हैं!!
मुकामे दिल समझना सब के हिस्से में कहाँ जाहिद!
जो अहले दिल हैं बस् वही मुकाम तिल् समझते हैं!!
किसी को कतल् कर देना नहीं है हिम्मतें मरदाँ!
जो मारे नफ्स को अपनें उसे कातिल समझते है!!
छुपाने से नहीं छुपती है कोई बात ऐ दावर!
हमारे दिल को क्या है मुर्शदे कामिल समझते हैं!!