84. परदा नज़र आता है

 

 

कहते हैं जिसे गौहर क़तरा नजर आता है!

वसअत में अगर देखो दरीया नज़र आता है!!

 

कीना हो भरा दिल में काफिर से भी बदतर है!

अच्छाई अगर है तो मौला नज़र आता है!!

 

मूसा को कहाँ आँखें जो देख सके जल्वा!

हम को तो हर एक लम्हा जल्वा नज़र आता है!!

 

क्या शेख व बरहमन् भी पीने लगे अँगूरी!

दरवाजे पे क्यों हर वक्त परदा नज़र आता है!!

 

जाहिद को भी देखा हूँ करते हुए सजदा मैं!

उस बुत् का मुकाम अबतो ऊँचा नज़र आता है!!

 

दुनिया की रियाकारी और झूटी इबादत् भी!

जाहिद तेरे मसकन में क्या क्या नजर आता है!!

 

क्यों जाओं हरम को मैं क्यों ढून्डूं कलिसा में!

आईनये हस्ती में चेहरा नज़र आता है!!

 

शायद के नमाजी ने ईमान बदल डाला!

बुत् खाने में अब उसका कब्जा नज़र आता है!!

 

उठती है नज़र मेरी काबा की तरफ दावर!

मुर्शद नज़र आता है आका नज़र आता है!!

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