83. वली कामिल

 

 

ग़यास-उद-दीन सुल्तानी मोहिउद्दीन जिलानी

वो मेरे पीर लासानी मोहिउद्दीन जिलानी

 

ख़ुदा-ए-पाक के इरफ़ान का तुम ही समंदर हो

ख़ुदा आशिक़ है रब्बानी मोहिउद्दीन जिलानी

 

कोई कामिल मुकम्मल आप सा दूजा नहीं हरगिज़

वली कामिल हो इंसानी मोहिउद्दीन जिलानी

 

ख़ुदा आशिक़ तुम्हारा और तुम माशूक-ए-रहमान के

हो तुम माशूक-ए-रहमानी मोहिउद्दीन जिलानी

 

वुज़ू कर के मेरे ग़ौस-उल-वरा का नाम लेते थे

सभी कहते हैं सुब्हानी मोहिउद्दीन जिलानी

 

सभी मोहताज हैं उनके करामात के वो आज़म हैं

हैं ऐसे ग़ौस-ए-समदानी मोहिउद्दीन जिलानी

 

रसाई दो जहां की कुछ नहीं दुश्वारे दावर

ये इम्कानी भी यज़दानी मोहिउद्दीन जिलानी

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