82. मंक़बत-ए-गौस

 

 

गौस-उल-वरा मैं हूँ ख़ादिम तुम्हारा

ख़ादिम को है बस तुम्हारा सहारा

 

इमदाद क्यों कर ज़माने से माँगूँ

कि मुझको तो है बस तुम्हारा सहारा

 

तुम बिन मेरा कोई हामि नहीं है

मुश्किल में है तुमको ख़ादिम पुकारा

 

रंज-ओ-मुसीबत में है मेरी कश्ती

फँसी गौस-ए-आज़म लगा दो किनारा

 

कि तुम नाख़ुदा बनके गर न बचाए

नहीं देख पाएगी हरगिज़ किनारा

 

ये ख़ादिम की फ़रियाद और इल्तिजा को

तुम न सुनोगे तो है कौन चारा

 

ये फ़रियाद सुन कर के दिलशाद करना

ख़ादिम सदा दे रहा है तुम्हारा

 

मैं गौस-ए-पिया के चमन का हूँ बुलबुल

ये बुलबुल का हो वो चमन में गुज़ारा

 

दावर का जीना है गौस-उल-वरा से

बस इसके सिवा कुछ नहीं है गवारा

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