तेरे रहने के लिए मस्कन् मेरा क्या दिल न था!
मैं तेरे काबिल न था या तू मेरे काबिल न था!!
कर चुका हूँ होश के आलम में तकमीले जुनू!
कैस के मानिंद मैं दीवाना महफिल न था!!
एक जरा गर्दन झुकाई देख ली सूरत तेरी!
तुझ को पा लेना तो मेरे वासते मुशकिल न था!!
नफ्से अम्मारा का मुझको अबतो अन्देशा नहीं!
कतल उसको कर दिया हूँ जो मेरा कातिल न था!!
क्या डुबोती मेरी कश्ती को तलातम की लहर!
जोरे तूफाँ था मगर गारत गर साहिल न था!!
चार अनासिर से मुकम्मिल कर दिया तू मुझे!
तू ही अब इमान से कहदे के तू शामिल न था!!
मैं अगर हासिल कहूँ तो है तकब्बुर की ये बात!
हासिले ईमाँ यहि है मुझको कुछ हासिल न था!!
राहबर था साथ मेरी रहबरी के वासते!
नाज है मुझ को के मैं गुम करदये मंजिल न था!!
ये रफीकी फैज है और है मुनव्वर का करम!
कौन कहता है के दावर मुर्शदे कामिल न था!!