80. मेरे महबूब सुब्हानी

मुझस्सम नूर शमा हैं मेरे महबूब सुब्हानी

वो पर्दा हो के ज़िंदा हैं मेरे महबूब सुब्हानी

 

ख़ुदाई नाज़ करती है जनाब-ए-गौस-ए-आज़म पर

मुहम्मद का इरादा हैं मेरे महबूब-ए-सुब्हानी

 

मुहम्मद मुस्तफ़ा की आल से पैदा हुए हैं वो

के वो नूर सरापा हैं मेरे महबूब-ए-सुब्हानी

 

शब-ए-मेराज में गौस-उल-वरा मौजूद रहकर के

चढ़ाए देके कांधा हैं मेरे महबूब-ए-सुब्हानी

 

अरब में दीन फैलाए मुहम्मद मुस्तफ़ा पहले

हमें बतलाए आका हैं मेरे महबूब-ए-सुब्हानी

 

जनाब-ए-गौस को जाहिद जुदा क्यों कर समझते हो

के वो भी नूर-ए-मौला हैं मेरे महबूब-ए-सुब्हानी

 

ग़यास-उद-दीन हैं दावर शाह-ए-बग़दाद जिलानी

ग़ुलामों पर वो शैदा हैं मेरे महबूब सुब्हानी

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