77. कोई नमरूद हो गया

 

 

पहले जो अब्द था वही माबूद हो गया!

इन्कार करने वाला तो मरदूद होगया!!

 

आदम् को कह दिया के तू ही मेरा राज है!

जिस ने बनाया खुद वही मौजूद हो गाया!!

 

कोई समझ सका ना ये कुदरत के भेद को!

मौजूद हो के सब का ओ मसजूद हो गया!!

 

मुर्शद से अपने पालिए रब्बुल ऊला को हम्!

जो पीर है हमारा वो मसजूद हो गया!!

 

इन्नी अना को कहना ये आसान तो नहीं!

फिर्औन कोई और कोई नमरूद हो गया!!

 

लाहौत के मुकाम पे इन्नी अना दुरूस्त!

हामिद् कोई बना कोई महमूद होगया!!

 

दावर मेरी जबान पे अनलहक्क की है सदा!

आवाज देने वाला ही मौजूद हो गया!!

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