अज़मत में क्या करूँ बयां रोशन ज़मीर की
दोनों जहां में शान है पीराने पीर की
गौस-उल-वरा के वाकिये कुछ कम नहीं मगर
ज़िंदा करामतें हैं वो कामिल फ़क़ीर की
हर औलिया को नाज़ है रहबर हैं गौसे पाक
लाखों हैं मेहरबानियाँ अब दस्तगीर की
इश्क-ए-मोहम्मदी का समुंदर हैं गौस पाक
हम मिस्ल-ए-कश्तियाँ हैं उसी बे-नज़ीर की
हम आज दींदार हैं उनके तुफैल से
दिल में जो रोशनी है ख़ुदा के मुनीर की
ज़म्बील छीन ली थी फ़रिश्ते के हाथ से
जुर्रत जनाब-ए-गौस की अब्द-ए-क़दीर की
ठोकर लगा के मुर्दे जिलाना था उनको खेल
दावर ख़ुदा की मर्ज़ी थी रोशन ज़मीर की