74. मेरा गुलाम होजाये

 

 

हमारे हाथों से एक ऐसा काम हो जाये!

के दो जहाँ में हमारा भी नाम हो जाये!!

 

तुम्हारे अकदसे नालैन में है जान मेरी!

तुम्हारे कदमों में मेरा मुकाम हो जाये!!

 

नमाज आज सरे मैकदा पढूँगा मैं!

पिलाने वाले से कहदो इमाम् हो जाये!!

 

शराब अपने लिए हम हलाल करतें हैं!

जो आये होश में उसको हराम हो जाये!!

 

अयाज हक्क हूँ न महमूद कोई समझे मुझे!

के बादशाह भी मेरा गुलाम होजाये!!

 

जो रखना हो तो रखो मुझको अपने कदमों में!

तुम्हारे चाहने वालों में नाम हो जाये!!

 

रफीक फूल हूँ ये इलतिजा है अये  दावर!

के उन के साये में बस् मेरी शाम हो जाये!!

 

 

 

(मिलेगें  दावर  दिलों जिगर में समाये जल्वा नज़र नज़र मे!

दुआयें मांगे हजार तरह मगर जरुरी दुआ असर में!!)

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