74. गौस-ए-आज़म

 

 

हैं माशूक-ए-रहमान मेरे गौस-ए-आज़म

वो वलियों के सुल्तान मेरे गौस-ए-आज़म

 

कहे क़ुम बा इज़्नी तो मुर्दे उठे हैं

मुहीउद्दीन जिलान मेरे गौस-ए-आज़म

 

लिए दोश पर मुस्तफ़ा के क़दम को

विलायत है ज़ीशान मेरे गौस-ए-आज़म

 

अल-इंसान सीरी जो क़ौल-ए-ख़ुदा है

अना सीरी इंसान मेरे गौस-ए-आज़म

 

ख़ुदा से निराली ख़ुदाई है इनकी

वो ख़ालिक-ए-यज़दान मेरे गौस-ए-आज़म

 

फ़रिश्ते भी हम्द-ओ-सना में हैं इनकी

हैं महबूब-ए-सुब्हान मेरे गौस-ए-आज़म

 

सदा बे-नियाज़ इनको दावर है देखा

जो हैं गौस-ए-समदान मेरे गौस-ए-आज़म

-+=
Scroll to Top