73. शाराब आधी गुलाब आधा

 

 

चमकता शीशा छलकता सागर शराब आधी गुलाब आधा!

पिला रहे हैं हमारे  दावर  शाराब आधी गुलाब आधा!!

 

यहाँ हैं मैकश वहाँ हैं साकी नजर नजर में न फर्क बाकी!

वो दे रहे हैं हमें ये कहकर शाराब आधी गुलाब आधा!!

 

खुदी के नशे में झूमते हैं हम अपनी मस्ती में घूमते हैं!

खराबे जाहिर हुए हैं पी कर शराब आधी गुलाब आधा!!

 

हरम व काबे में जा तू जाहिद हमारी मस्जिद तो मैकदा है!

पियेंगे दिल से वजु बनाकर शराब आधी गुलाब आधा!!

 

वो अर्श मेरा ये फर्श मेरा वो तूर मेरा ये दार मेरा!

मैं पी रहा हूँ मिला मिलाकर शराब आधी गुलाब आधा!!

 

उठा के सागर जो देखा मैं ने मेरा सनम् ही छुपा हुआ था!

उरूज पर है मेरा मुकद्दर शराब आधी गुलाब आधा!!

 

रफीक साकी सदा सलामत है याद उन की मेरी इबादत!

बहा के आँसू कहे हैं  दावर  शराब आधी गुलाब आधा!!

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