72. वली दो जहां के

 

 

मैं हूँ ग़ौस का दीवाना, मेरी उनसे ज़िंदगी है

माशूक हैं वो मेरे, मुझे उनसे आशिक़ी है

 

है ख़ुदा भी उनका आशिक़, क्यों जहां न होगा शैदा

वो वली हैं दो जहां के, वो जहां की रौशनी है

 

मेरे ग़ौस के करम से, मुर्दे भी जी उठे हैं

मेरे ग़ौस वो वली हैं, कि उन्हीं से ज़िंदगी है

 

मेरे ग़ौस के करम से, हमें दीन है मयस्सर

हमें दीन वो सिखाए, कि उन्हीं से बंदगी है

 

सभी बुत को पूजते थे, था कुफ्र में हिंद सारा

न थे हिंद में मुसलमां, ये उन्हीं की पैरवी है

 

मेरे पीर ग़ौस आज़म, ख़्वाजा को हिंद भेजा

मेरे ग़ौस के फ़ज़ल से, कि यहाँ दीन आज भी है

 

मिला ग़ौस का वसीला, तुझे क्या कमी है दावर

है नसीब तेरा अच्छा, तू बड़ा ही क़िस्मती है

-+=
Scroll to Top