72. कोई जाना ना पहचाना

 

 

ये आदम् राजे  दावर  है कोई जाना ना पहचाना!

खुदा खुद छुप के अन्दर है कोई जाना न पहचाना!!

 

मन् अर्फ नफ्स हू से दूर क्यूँ रहता है अये जाहिद्!

वही तो रब्बे अकबर है कोई जाना न पहचाना!!

 

अल् इन्सान सिर्री वो अना सिर्री हू ये कहकर!

यही एक राजे दीगर है कोई जाना न पहचाना!!

 

मिसाले आईना मोमिन का दिल है जान ले नादान!

इसी में शक्ल दिलबर है कोई जाना न पहचाना!!

 

फसूहुम्मा वजुहु अल्लाह कहता है कुरआन रब्बा का!

जिधर देखो तो अकसर है कोई जाना न पहचाना!!

 

खुदा को ढून्डना मकसूद हो तो आप में ढून्डो!

ये आदम शक्ले दावर है कोई जाना न पहचाना!!

 

बनाया अपनी सूरत पर हमें ये नाज है  दावर!

यही तो शाने मजहर है कोई जाना न पहचाना!!

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