मुकामे अनहद् से मैं गुजर कर दुई का परदा हटा रहा हूँ!
तुम्हारी सूरत का अक्स लेकर मैं अपनी सूरत बना रहा हूँ!!
मैं आइना हूँ तू अक्स मुझ में है फर्क इतना तेरे मेरे में!
नजर नजर में तुझे समाकर मैं अपने दिल में बसारहा हूँ!!
फलक से जिसदम लतलब हुई है रसाई मेरी कोई ये देखें!
जहाँ ना जिबरील जासके हैं वहाँ से आगे मैं जारहा हूँ!!
बना के आदम का एक पुतला बनाने वाला खुद उस में पहुंचा!
जो देखा गरदन झुका के उस को मैं आप अपने को पा रहा हूँ!!
खुले ना गँजे खफी किसी पर ये राजे बातिन कोई ना जाने!
इसी लिए तो मैं वक्ते बैयत जबान अपनी कटा रहा हूँ!!
मन अर्फ मंजिल में जो है पहुंचा कद अर्फ कहना पड़ा है उसको!
मैं बुतकदा के बस् एक सनम् पर ये अपनी हस्ती मिटा रहा हूँ!!
मैं दीद बाजों में हूँ सुखन्वर किये हैं मुझ पर करम मुनव्वर!
रफीक आका को आज दावर में अपनी नजरों में पा रहा हूँ!!