68. फ़ातिमा वाले

रुबाई

 

कर्बल का वाक़िया मैं बताता हूँ दोस्तों

कर्बल में क्या हुआ है दिखाता हूँ दोस्तों

थामो जिगर को पहले फिर ये दास्तान सुनो

हालात कर्बला के सुनाता हूँ दोस्तों

 

 

फ़ातिमा वाले

 

 

ज़मीन कर्बला की ये रोकर कही है

हुसैन इब्न-ए-हैदर यहाँ आज भी है

 

बोला यज़ीद आओ यहाँ एहतमाम है

आओ हुसैन आप को हमारा सलाम है

हम साथ हैं तुम्हारे तन्हा चले आओ

बैयत करेंगे आप से सब इंतज़ाम है

 

हुसैन बोले मैं तन्हा ही कैसे आऊँगा

मैं अपने साथ में लश्कर भी मेरा लाऊँगा

यज़ीद बोला कि लश्कर की क्या ज़रूरत है

हुसैन बोले मैं आकर तुम्हें बताऊँगा

 

यज़ीद बोला हम सारे तुम्हारे साथ में हैं

हम सब के सब ही यक़ीनन एक बात में हैं

यक़ीन दिलाया इमाम हुसैन को है यज़ीद

बुलाया धोखे से हसनैन को वहाँ पे पलिद

 

हुसैन निकले बहत्तर को साथ में लेकर

वो सब हमारे हैं कूफ़े में साथियाँ लेकर

हमारी फ़ौज से बढ़ कर के उनकी फ़ौजें हैं

थे उनके साथ में अब्बास भी अलम लेकर

 

हुसैन के साथ फ़क़त सिर्फ उनका कुनबा था

ना दूसरा कोई बाहर एक बच्चा था

निहत्ते निकले थे सब घर से फ़ातिमा वाले

किए थे साज़िशें पहले ही से कूफ़िया वाले

 

के जैसे पहुँचे वहाँ मुरतज़ा के घर वाले

तो आके घेर लिए शिमर के लश्कर वाले

तो बड़ के कहने लगे आओ ऐ इमाम आओ

के जितने साथ में आए हैं वो तमाम आओ

 

तो जम गए सभी कर्बला के मैदान में

सब आके कहने लगे कर्बला के मैदान में

तुम्हें बुलाए हैं बस इतनी बात करने को

नहीं बुलाए तुम्हें लड़ने और झगड़ने को

 

बस इतना सुनना ही था पूछे इमाम हुसैन उनसे

इरादा क्या है तुम्हारा बताओ साफ हमसे

तो बोले सब ने तुम दीन-ए-मआरिफ़त छोड़ो

तुम हम से बैयत करो और हमारे साथ हो लो

 

हुसैन बोले तुम्हारी ये शर्त नहीं मंज़ूर

हमारे आगे से हट जाओ और निकलो दूर

तुम धोखा बाज़ हो मंशा तुम्हारा गंदा है

तुम बद ख़िसाल हो ये ही तुम्हारा धंधा है

 

ग़ज़ब में आ गए कुफ़्फ़ार मुशरिकीन सारे

हुसैन वालों पे तब ही लगा दिए पहरे

हुसैन वालों पे ज़ालिम बड़े सितम ढाए

तो उनके वास्ते पानी भी बंद कर डाले

 

तो भूखे प्यासे ही कुछ दिन गुज़र गए उन पर

तो कूफ़े वाले न क्या क्या सितम किए उन पर

शिमर लईनों ने कय्यों को क़त्ल कर डाला

और छोटे बच्चों को भी ज़ालिम ने न बख़्शा

 

वहाँ का वाक़िया तफ़्सील से सुनोगे अगर

कलेजा फट जाएगा ख़ून रोएगी ये नज़र

हुसैन लाखों के छक्के वहाँ छुड़ा डाले

और वक़्त आख़िर सजदे में सर कटा डाले

 

ये वाक़िया तुम्हें फिर और कभी सुनाऊँगा

हुआ था कूफ़े में क्या क्या तुम्हें बताऊँगा

ज़मीन-ए-कर्बला देखी है ख़ून का मंज़र

ये कैसे सह लिया कर्बल का वाक़िया दावर

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