यही मेरे रहबर के घर की गली है
इसी घर से सब को विलायत मिली है
विलायत का दरबार ये अंजुमन है
इसी अंजुमन से फकीरी चली है
शहंशाहियत को भी ठोकर लगा कर
शहंशाह कहे हैं फकीरी भली है
यहाँ फ़ैज़ रहमत बरसती है हर दम
नहर बन के रहमत यहीं से चली है
अली मुरतज़ा की है सूरत ख़ुदा की
ख़ुदा खुद कहा मेरी सूरत अली है
चलो मोमिनों तुम उसी घर का रास्ता
इसी घर की मंज़िल में सिर्रि चली है
ऐ दावर रफ़ीक़ों का साँचा नहीं है
ढलाया है सूरत जो खुद की ढली है