गोहर मकान में हम एक घर बना लिए हैं!
अक्से रूखे मुनव्वर दिल में समा लिए हैं!!
क्यों फैज हम ना पाये अब् तेरे आसताँ से!
अपनी जबीन उलफत् दर् पर झुका लिए हैं!!
जो दर्द में है लज्जत वो हम से कोई पूच्छे!
जो गम् है तू ने बख्शा वो गम् उठा लिए हैं!!
आँखों से तू ने अपनी क्या खूब मैं पिलाई!
तेरे करम से हमने बिगड़ी बना लिए हैं!!
नख्शे कदम पे तेरे हम ने जबीन झुकाई!
बस् एक सजदा करके हम तुझ को पालिए हैं!!
हम बे खुदी में अपनी तुझ को पुकारते हैं!
रोका किसी ने हमको मेहशर उठा लिए है!!
चाहूँ अगर मैं बोलूँ राजे शराब क्या है!
दावर जबाँ को अपनी हम ने कटा लिए है!!