शबे मेराज में जाकर मेरे आका ने क्या देखा
वहाँ एक आईना था आईने को आईना देखा
सिवा नूर-ए-मुहम्मद के नहीं था दूसरा कोई
उसी नूर-ए-अज़ल को यह जहाँ रहे नुमा देखा
मुहम्मद मुस्तफा अर्श-ए-बरी़ पर थे अहद बनकर
बदल कर नाम वो अपना ज़मीन पर आ गया देखा
यह एक ही शान के दो नाम हैं अहमद अहद लेकिन
कोई समझा तो क्या समझा कोई देखा तो क्या देखा
मेरे आका को जब के याद आया हू का वो आलम
जहाँ सदियों अकेले थे वहाँ तन्हा ही जा देखा
यकीन जानो जहान-ए-कुल का मालिक अनफिरादी है
नबी मुख्तार-ए-आलम हैं नहीं और दूसरा देखा
शब-ए-मेराज अपने राज का एक राज है दावर
अजीब हिकमत मुहम्मद की अजीब एक माजरा देखा