58. हुवलकुल

 

 

तशरीफ नबी हैं लाए वो अर्श-ए-अला से आए

छोड़ दिए थे हक का रास्ता आके वो राह दिखाए

 

भूल गए थे हम सब हक को अपना लिए थे हम ना हक को

छाई हुई थी गफलत हम पर आके नबी हैं बचाए

 

हम जो किये थे रब से वादा आके जहां में भूल गए थे

फिर से हमें वो होश में लाकर याद-ए-खुदा हैं दिलाए

 

वो नहीं आते हम फंस जाते दोनों जहां में सदमे उठाते

हो के मेहरबान हम पर आखा रहमत हैं बरसाए

 

हम को मिला दामान-ए-मुहम्मद खौफ नहीं अब दिल में हश्र का

मिल गया जिन को उनका वसीला वो ना कभी घबराये आए

 

हम पे नबी का दस्त-ए-करम है बोलो हमें किस बात का डर है

हम को बचाने दोनों जहां में रहमत-ए-आलम आए

 

दावर का ईमान नबी हैं और दावर की जान नबी हैं

हम पे हुआ एहसान नबी का दस्त-ए-करम फरमाए

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