57. अल्फ़ाज़ ही नहीं

 

 

सल्ले अला हुज़ूर का सानी कोई नहीं

मेरे नबी के बाद कोई भी नबी नहीं

 

मेरे नबी के सदके से रोशन है कायनात

इस रोशनी के बाद कोई रोशनी नहीं

 

सदके हो दो जहान भी सदके हो कायनात

यह इश्क की ज़बान है दीवानगी नहीं

 

हम को मिले नबी यह मुकद्दर की बात है

सब कुछ मिला नसीब से कुछ भी कमी नहीं

 

कुल कायनात नूर मोहम्मद से है बनि

यह बात है अज़ल की मगर आज की नहीं

 

वस्फ़-ए-नबी के वास्ते ख़ासिर है हर ज़बान

तारीफ़ उनकी करने को अल्फ़ाज़ ही नहीं

 

दावर हुआ है फ़ैज़ की दौलत से सरफ़राज़

दोनों जहान में आप सा कोई सखी नहीं

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