56. मेहरबान होकर

 

 

जहाँ में आए नबी रहमत-ए-जहाँ होकर

हमारे वास्ते आए हैं मेहरबान होकर

 

भटक रहे थे ये अहल-ए-जहाँ अंधेरे में

नबी करीम चले आए ज़ौफ़िशाँ होकर

 

भटक के सारे न जाने कहाँ चले जाते

संभाले हम को नबी ही ने पासबान होकर

 

नबी के सदके से ईमान की मिली दौलत

नबी न आते तो मर जाते बे-ईमान होकर

 

हमेशा फ़िक्र में रहते हैं आप उम्मत की

बचाए आप हैं उम्मत को मेहरबान होकर

 

मिला वसीला नबी का तो कामियाब हुए

करम न होता तो हम जाते राइगाँ होकर

 

नबी का दस्त-ए-करम सर पे है मेरे दावर

पुकारूँ सल्ले अला क्यों न शादमाँ होकर

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