या नबी जो तुम्हारा नहीं है वो कसम से हमारा नहीं है
आप से प्यार जिस को नहीं है उसका कोई सहारा नहीं है
जो मुहम्मद का है वो खुदा का वरना उम्मति नहीं मुस्तफा का
बे सहारा हश्र में रहेगा जो मुहम्मद को प्यारा नहीं है
जान लो कि समंदर खुदा है इस में कश्ती मेरे मुस्तफा हैं
ना खुदा चाहिए ये चलाने वरना उसका किनारा नहीं है
मौजे तूफान में जो फंस गया है उसको इमदाद की है ज़रूरत
ना बचेगा बगैर अज़ तुम्हारे जो कि तुम को पुकारा नहीं है
उम्मत-ए-मुस्तफा का है रुतबा अगले पैग़म्बरों से भी बढ़कर
जो वसीला नबी का न लेगा वो खुदा को भी प्यारा नहीं है
कह रहा है खुदा खुद ज़ुबान से आशिक-ए-मुस्तफा मेरा बंदा
या नबी आपका जो नहीं है वो मुझे भी गवारा नहीं है
आप का आसरा लेकर दावर कामियाबी हश्र की कमाया
था तसव्वुर में हर दम नबी के दूसरा कुछ नज़ारा नहीं है