ग़ुलामान-ए-मुहम्मद की इबादत ख़ाकसारी है
हश्र के दिन यही वो चीज़ जो मीज़ान पे भारी है
कोई उक़्बा का तलिब है कोई हूरों का शैदाई
ये चीज़ें मांगने वाला बड़ा ऊँचा भिखारी है
किसी को नाज़ सजदों पर किसी को नाज़ तक़वा पर
इसी नाज़ो गुरुर से हुआ शैतान नारी है
गुरुर छोड़ दो, आज़िज़ बनो राज़ी ख़ुदा होगा
ख़ुदा उससे है राज़ी जिसके अंदर इन्क्सारी है
ख़ुदा राज़ी अगर होकर तमन्ना मेरी पूछेगा
मैं कहे दूंगा अता कर दे जो तुझको चीज़ प्यारी है
हमें मालूम ही न था हमारा कौन है ख़ालिक
मुहम्मद मुस्तफ़ा बतलाये ख़ालिक रब-ए-बारी है
हमेशा ख़ाकसारी इन्क्सारी में रहा दावर
उसी को मान कर सब कुछ बना बैठा पुजारी है