47. वो सब कुछ कर दिखाते हैं

 

 

मेरे सरकार ही आकर सर-ए-महशर बचाते हैं

वो साक़ी आब-ए-कौसर के वही कौसर पिलाते हैं

 

ये रास्ता वो के जिस पर चल के सारे हक़ को पाते हैं

वो गुमराह हो नहीं सकते जिसे आखा  दिखाते हैं

 

जो राह-ए-हक़ पे चलते हैं वही हैं औलिया अल्लाह

ये दुनिया क्या मिटाएगी जिन्हें आखा बचाते हैं

 

भरोसा मुस्तफ़ा पर है सभी को ता हश्र यारो

शफ़ाअत इन से होती है यही बख़्शिश करते हैं

 

मैं अपनी जान भी क़ुर्बान कर दूँ उनकी मर्ज़ी पर

मेरा ईमान है उन पर लहद में वही आते हैं

 

मेरे सरकार का रुतबा है क्या ज़ाहिद न जानेगा

कुफ़्र को आन कि वो आन में आख़ा मिटाते हैं

 

बशर क्या चीज़ है दावर गवाही दे दे कंकर

मुहम्मद वो पैग़ंबर हैं वो सब कुछ कर दिखाते हैं

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