मैं गदाये मुस्तफा हूँ मुझे मिल गया खरीना!
मेरी आँख में है मक्का मेरे दिल में है मदीना!!
है रसाई की तमन्ना दरे मुस्तफा पे जाऊं!
वहीं है खुदाये अकबर् वहीं अर्श का है जीना!!
ये गुलाब व इत्र उन से सदा मांगते हैं खुशबो!
है चमन से भी मोअत्तर शहे दीन का पसीना!!
मुझे खोफ मौज क्यों हो मुझे क्यों गमे तलातम्!
है सहारे मुस्तफा के मेरे ईश्क का सफीना!!
वो लहद् के भी अन्धेरे मुझे क्या डरा सकेंगे!
मेरे सीने में है रोशन बडा कीमती नगीना!!
कोई मेरे दिल से पूछे मेरी हर खुशी को पैहम्!
मेरे हाथ आगया है सरे हश्र का खरीना!
ये मेरे रफीक आका का करम् है मुझपे दावर!
मेरे पीछे रह गया काबा मेरे आगे है मदीना!!