मुहम्मद सिरे गौहर है कोई जाना न पहचाना
वही एक नूर-ए-अख्तर है, कोई जाना न पहचाना!
वही खालिक से वासिल है, वही मखलूक में शामिल
अजब कुछ भेद नादिर है, कोई जाना न पहचाना!
वही अव्वल से अव्वल है, वही आखिर से आखिर है
वही बातिन से ज़ाहिर है, कोई जाना न पहचाना!
वो थे तिरसठ बरस दुनिया में आकर बन के पैगंबर
अना अंत से ज़ाहिर है कोई जाना न पहचाना!
वो जल्वा खास था खुद नहेनू अकरब बोला क़ुरआन में
ए आयत सोब में नादिर है, कोई जाना न पहचाना!
मुहम्मद सिरे हक है जात-ए-मुतलक अफजल-ओ-अकमल
मुअम्म राज़ दीगर है कोई जाना न पहचाना!
हमारा दिल भी क्या दिल है, अजब नूरानी मसकन है
उसी में अपना दिलबर है, कोई जाना न पहचाना!
वही है जल्वा फर्मा बाग़-ए-आलम में हमेशा से
मगर यं लोग दर दर है कोई जाना न पहचाना!
नहीं है दूसरा दीगर अल इंसानु सिरी ये कहकर
यही मन अर्फा से ज़ाहिर है, कोई जाना न पहचाना!
यही है रम्ज़ इरफान नूर-ए-वहदत गंज-ए-मख़्फ़ी भी
यही कद अर्फा से अक्सर है, कोई जाना न पहचाना!
मुन्नवर इश्क-ए-अहमद का है मादान रोज़-ए-अव्वल से
उसी का राज़ दीगर है, कोई जाना न पहचाना!