45. पैगाम तुम्हारा

 

 

शाफ़ी-ए-महशर साक़ि-ए-कौसर हम ने पिया है जाम तुम्हारा

विर्द ज़ुबान पर मेरी हमेशा रहने लगा है नाम तुम्हारा

 

सब से भले या सब से बुरे हैं कुछ भी हैं लेकिन आपके ख़ादिम

रोज़-ए-हश्र या हामि-ए-उम्मत हम को बचाना काम तुम्हारा

 

पैदा हुए हम बंद थी आँखें आँख खुली तो आपको देखे

सीखे सबक इतना सा उम्र भर काफ़ी है हमको नाम तुम्हारा

 

ना तो वज़ू आता है मुझको ना तो नमाज़ आती है मुझको

सर को झुका लेता हूँ सुनकर जब आता है नाम तुम्हारा

 

ज़ाहिद-ओ-मुल्ला कर के दिखावा ऐन इबादत भूल गए हैं

फ़ैज़-ए-हिदायत बैर है उनसे कैसे वो ले इल्हाम तुम्हारा

 

नाम-ए-ख़ुदा और नाम मुहम्मद काफ़ी है मुझको लहद में बचने

मुनकिर-ओ-नकीर जब आएं लहद में कह दूँगा पैगाम तुम्हारा

 

कर के किनारा इस दुनिया से इश्क़ में दावर डूब गया है

एक ही ज़िक्र और एक वज़ीफ़ा सुबह से लेकर शाम तुम्हारा

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