43. मोहम्मद् का सवाली

 

 

वो है एक मीम का परदा वही रंगे जमाली है!

ये चिलमन् गैंजे मख्फी है बड़ी ही राज वाली है!!

 

नहीं जिस को मोहब्बत् कमली वाले से वो इन्साँ क्या!

करे वो लाख सजदे इश्क से दिल उसका खाली है!!

 

कयामत् में मोहम्मद को मोहम्मद खुद नज़र आये!

के दिल के आईने में खुद ही एक अक्से जमाली है!!

 

सरे महशर कुछ इस अंदाज् से उनको पुकारूंगा!

मेरी आवाज़ में जाहिद जरा सूजे बिलाली है!!

 

गुलामे मुस्तफा हूँ कोई क्या टकरांयेगा मुझ से!

मेरा दिल आइना है और जबाँ मेरी कमाली है!!

 

बहुत ही फर्क है नासेह् तेरी बातों में और मुझ में!

के मेरा दीन ईमाँ है तेरा मज़हब खयाली है!!

 

समझता क्या है अये रिज्वाँ ये दीवाना है दीवाना!

अरे नादान ये  दावर  मोहम्मद् का सवाली है!!

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