29. स्सूले अनाम से

 

 

हैराँ हैं अर्श वाले भी मेरे कलाम से!

आवाज दे रहा हूँ तुम्हें हर मुकाम से!!

 

मकबूल क्यों न हो मेरी हर एक दुआ नदीम!

सरकारे दो जहाँ को है उलफत् गुलाम से!!

 

तिश्न लबी का किस लिए शिकवा करूंगा मैं!

बुझती है प्यास साकी कौसर के जाम से!!

 

इश्के नबी से दिल मेरा मामूर क्यों न हो!

निसबत है खास मुझ को स्सूले अनाम से!!

 

मेरी नज़र में गुंबदे खिजरा समा गया!

अब वासता नहीं है मुझे खास व आम से!!

 

कह दूंगा बे खतर के नबी का गुलाम हूँ!

कोई करे सवाल जो इस तिश्न काम से!!

 

क्या ये करम नहीं है मोहम्मद के फैज का!

मशहूर हो गया हूँ जो दावर  के नाम से!!

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