162. ज़ाहिरी अपना सजदा नहीं है

 

 

फरक अन्ता अना का अये जाहिद् आज तक तूने समझा नहीं है!

है खुदा तेरा परदे के अन्दर हाँ मगर हम से परदा नहीं है!!

 

हम ने एक बुत को दिल में बसाया और हर वक्त करते हैं सज़दा!

देखले तू इबादत् हमारी ज़ाहिरी अपना सजदा नहीं है!!

 

जिस घडी नज़रें हम ने झुकाई आगया सामने रब्ब हमारा!

बन्दगी उस ख़ुदा की है कैसी आज तक जिसको देखा नहीं है!!

 

अये कलीम इतनी जल्दी न जाओ साथ में अपने हम को भी लेलो!

हम संभालेंगे तुम को यकीनन कोई मामूली जल्वा नहीं है!!

 

मेरा दिल एक काबा बना है एक सनम् लाके रखा है मैं ने!

लोग कहते हैं मुझको पुजारी मुझको लोगों की परवा नहीं!!

 

तेरे और मेरे सजदों में जाहिद् फरक ही फरक सबको मिलेगा!

तेरा सजदा तमाशा बना है मेरा सजदा तमाशा नहीं है!!

 

दैर व काबे से हूँ दूर दावर मेरा माबूद है दिल् के अन्दर!

दूसरों को खुदा क्यों कहूँ मैं दूसरों का भरोसा नहीं है!!

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