13. हर ज़बां पर रहे

 

 

मेरे खादिर यही इल्तिजा है मेरी वक़्त-ए-नज़ा नज़र आस्तां पर रहे

जिस्म से रूह जिस वक्त निकले मेरी कलमा मुस्तफ़ा ही ज़बां पर रहे

 

ज़िक्र लब पर हो रब्ब-उल-अला का सदा रूबरू मेरा मस्जूद मौजूद हो

मेरा दिल हो सदा मिस्ल-ए-रोशन शमा मेरी आँखें व दिल ज़ौफ़िशां पर रहे

 

मेरा दिलबर सदा हो मेरे साथ में उनका दामन सदा हो मेरे हाथ में

वस्ल होता रहे मुझ से हर हाल में मैं जहाँ भी रहूँ तू वहाँ पर रहे

 

मैं न तुझ से जुदा तू न मुझ से अलग ज़िंदगी भर रहा तू मेरे संग संग

तू तो हर वक़्त था मेरे नज़दीक तर और रख साथ में तू जहाँ पर रहे

 

क्या नक़ीरें करें आके मुझ से सवाल साथ में जबकि ख़ुद है मेरा ज़ुल्जलाल

इन में आदम है कौन कौन रब्ब-उल-अला देख कर हम को दोनों गुमां पर रहे

 

मेरा आखा तो मुझ में रहा इस तरह जिस तरह गुल में ख़ुशबू रही पोशीदा

तुझ को ज़ाहिर कभी मैं न होने दिया हम ज़मीं पर रहे आसमां पर रहे

 

मैं रहा सरवरी तू रहा खादरी जैसे गोहर मुनव्वर का लुत्फ़ व करम

हम रफ़ीक़ी हैं दावर हमें नाज़ है इस लिए कि हमें हर ज़बां पर रहे

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