129. मेरे दस्तगीर की

 

 

उन में ना चाल है मेरे पीराने पीर की!

पीरी मुरीदी करते हैं मुनकिर नकीर की!!

 

बद्कार बद चलन् की तरह घूमते हैं वो!

गाँजा शराब पी के सदा झूमते हैं वो!

तौहीन हो रही है मेरे दस्तगीर की!

पीरी मुरीदी करते हैं मुनकिर नकीर की!!

 

हर बात में कुरआन सुनाते हैं आज कल!

हजरत के भी हदीस बताते हैं आज कल!

और कुछ किताब रखते हैं रोशन जमीर की!

पीरी मुरीदी करते हैं मुनकिर नकीर की!!

 

वाकीफ नहीं हैं कल्मे से कल्मा पढाते हैं!

अपनी बगल में देखिये रब को दिखाते हैं!

जागीर मिलगई है शहे बे नजीर की!

पीरी मुरीदी करते हैं मुनकिर नकीर की!!

 

दाढी भी एक हाथ की रखते हैं ऐसे पीर!

कहलाते हैं जमाने में अपने को वो फकीर!

खाते हैं वो कसम भी अरब के अमीर की!

पीरी मुरीदी करते हैं मुनकिर नकीर की!!

 

रंगीन कपडे पहन के इठलाके चलते हैं!

पौडर लगाके चहरे पर बलखा के चलते हैं!

दिन रात फिकर रहती है बस रोटी खीर की!

पीरी मुरीदी करते है मुनकिर नकीर की!!

 

बेवा पे डाल देते हैं मक्कारियों का जाल!

और बाद में वो करते हैं शादी का भी खयाल!

लैला की है कहानी कभी राँझा हीर की!

पीरी मुरीदी करते है मुनकिर नकीर की!!

 

कादर बचाले सब को यहाँ झूटे पीर से!

दावर की इल्तिजा है ये रोशन जमीर की!

इज्जत से खेलते हैं मेरे दस्तगीर की!

पीरी मुरीदी करते है मुनकिर नकीर की!!

-+=
Scroll to Top