128. सन्दल

 

 

है ये सन्दल रफीकी मेरे पीर का!

कादरी पीर का सर्रवरी पीर का!!

 

आज गोहर भी आयेंगे सन्दल लिए!

और मुनव्वर जलायेंगे घी के दिये!

नाम रोशन करेंगे मेरे पीर का!

कादरी पीर का सर्रवरी पीर का!!

 

आज हूराने खुल्दे बरीं आयेंगी!

बागे जन्नत से फूल और कली लायेंगी!

रोजा महकायेंगी रब् के दिलगीर का!

कादरी पीर का सर्रवरी पीर का!!

 

आज की शब् सुबह तक सुहानी रहे!

आसमाँ से जमीं तक नूरानी रहे!

दर खुले गा यहाँ सब की तकदीर का!

कादरी पीर का सर्रवरी पीर का!!

 

पँजतन् पाक की ये नवाजिश हुई!

रहमते हक्क की चौखट पे बारीश हूई!

खूब मुहताज है आज ताबीर का!

कादरी पीर का सर्रवरी पीर का!!

 

जो भी माँगे मुरादें मिलेंगे यहाँ!

ये है दावर का एलान शक न गुम!

देख लो चेहरा मुर्शद की तस्वीर का!

कादरी पीर का सर्रवरी पीर का!!

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