127. अपनी क़िस्मत जगाए

 

 

पीर के पास जल्द आनारे

अपने ईमान को सजानारे

 

ले वसीला तू पीर कामिल का

वरना दोज़ख ही में ठिकानारे

 

क्यों तू ग़फ़लत में है अरे नादान

पर्दा ग़फ़लत का तू हटानारे

 

खेल और कूद में तू रहता है

अपने आखा को कब है मनानारे

 

ये भी तो ऐन है फ़र्ज़ तेरा

ज़िंदगी में ख़ुदा को है पानारे

 

मर्द-ए-मोमिन तलाश कर पहले

अपनी क़िस्मत को गर जगानारे

 

अपना मक़सद तमाम पाएगा

पीर दावर के पास जानारे

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