125. अपनी पनाह से

 

 

हरम के रास्ता से मंदिर की राह से आए

अभी अभी तो तेरी बारगाह से आए

 

ना पर्दा उठा ना चिलमन को हुई है जुंबिश

क़ायम बन के तेरी जलवागाह से आए

 

हमारे साथ में ज़ाहिद भी मैकदा पहुँचा

बड़ा नसीब था बच कर गुनाह से आए

 

किसी ने रोक लिया हम को अपनी राहों में

निकल के जिस घड़ी तेरी निगाह से आए

 

शरीक-ए-ग़म तो हज़ारों थे बज़्म-ए-जानां में

हम अपने आप ही अपनी पनाह से आए

 

मज़ा ना जाना हो जो मौत का वो हम से है दूर

जो मर चुके हैं वही मेरी राह से आए

 

बहुत ही सख़्त है इस शौक़ की गली दावर

इल्ला में फँस गए जब ला इलाह से आए

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