123. शिकवा गिला हो रहा है

 

 

रफीकी जो हक है अदा हो रहा है!

तेरे दरपे सजदा रवा हो रहा है!!

 

अजीब एक तमाशा यहाँ देखा मुर्शद!

के भाई से भाई जुदा हो रहा है!!

 

मुकाम ऐसा आता है इन्सान पे एक दिन!

पहुँचकर जहाँ वो खुदा हो रहा है!!

 

फसादों की जड़ है बडापन ये तेरा!

तरीका ये भाई बुरा हो रहा है!!

 

जताता है हर दम तू झूटी मुहब्बत!

तेरे कारखाँ सब रिया हो रहा है!!

 

हसद कीना मगरूरी और ये तकब्बुर!

ये सब रख के तू पारसा हो रहा है!!

 

रफीक आका आकर बचालेना सब को!

के दावर से शिकवा गिला हो रहा है!!

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