121. ये घर ख़ुदा का

 

 

दिल के अंधे दिल नहीं जाने कहते हैं दिलवाले हैं

मेरी समझ में यह आता है शैतानों के पाले में

 

रब तो दिल को घर कहता है वह खुद इसमें रहता है

वह नहीं चाहता तन्हा रहना साथ में कमलीवाले हैं

 

वह सब का है बंदा परवर मेरे नबी हैं उसके हमसफ़र

इन दोनों की एक है मर्ज़ी दोनों रहमतवाले हैं

 

यह कहता है बंदे हैं मेरे वह कहते हैं उम्मत मेरी

इन दोनों का एक है चेहरा एक सांचे में ढले हैं

 

रब को अगर तुम कुन हो समझे मेरे नबी को फ़ैकुन समझो

इन दोनों के चेहरे नूरी लेकिन आंखें काले हैं

 

दिल कोई ऐसी चीज़ है यारो दिलबर इसमें रहता है

दिल आईने जैसा है या रवैया अहल-ए-ख़िरद कहे डाले हैं

 

दिल है हीरा दिल है मोती दिल है शीशा दिल है गोहर

दिल-ए-दावर से जाकर पूछे दिल के बनाने वाले हैं

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