सीने में मेरे शम्मा जला कर चले गये!
एक और दर्द दिल में बसा कर चले गये!!
ये दिन कहाँ नसीब थे गफलत में थे हमे!
तकदीर जो थी सोई जगा कर चले गये!!
मंजधार में थी किश्ती हमारी फैंसी हुई!
तूफाने गम् से पार लगा कर चले गये!!
दिल में जो वसवसा था मेरे दूर होगया!
इलहाम और यकीन में लाकर चले गये!!
दर् दर् भटक रहा हूँ मैं उन की तलाश में!
जाने कहाँ नज़र में समा कर चले गये!!
अपनी मिसाल ऐसी के गुम् करदये सदफ़!
कतरे से हम को मोती बनो कर चले गये!!
आका रफीक रुख से परदा हटाइए!
दावर को अपने खूब रूला कर चले गये!!
(बिछायेंगे निगाहों से मजारे पाक पर दावर
क़मर कहता है तारों से समा जाओ इस चादर मे)