115. दामन-ए-पीर

 

 

पीर दावर के पास जा पहले

अपने सर को ज़रा झुका पहले

 

बाद मकसद ख़ुदा के पा लेना

अपने मकसद को आप पा पहले

 

तेरी दुनिया तुझे नहीं क़ायम

आख़िरत तू तेरी तू बना पहले

 

अच्छे किरदार काम आते हैं

अपने आमाल को रंगा पहले

 

दीन-ओ-ईमान से है बढ़कर क्या

अपने ईमान को सजा पहले

 

माल दुनिया का तू है शैदाई

इश्क़ कामिल ज़रा कम पहले

 

ज़िंदगी में निजात पाएगा

अच्छे लोगों के साथ जा पहले

 

काबा को बाद में तू पाएगा

पीर के नक़्श-ए-पा तू पा पहले

 

पीर दावर का थाम कर दामन

अपनी हस्ती है क्या तू पा पहले

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