115. काबा बनाकर चले हैं

 

 

फकीर आये दर पर सदा कर चले हैं!

सभी के लिए हम दुआ कर चले हैं!!

 

रखो दोस्ती तुम फकीरों से कायम!

ये जन्नत की कुंजी बना कर चले हैं!!

 

फकीरी में जितने भी हैं फर्ज देखो!

वो हर फर्ज को भी अदा कर चले हैं!!

 

लिबासे फकीरी की खुश्बू है ईमाँ!

ये खुश्बू सभी को सुँघा कर चले हैं!!

 

फकीरों में हरगिज़ तकब्बुर नहीं है!

हमेशा ये सर को झुकाकर चले हैं!!

 

जो है नहनु व अकरब वो कुरआन से है!

वो नज़दीक तर है दिखाकर चले हैं!!

 

नहीं शीश महलों में नायाब गोहर!

फकीर अपनी झोली में पाकर चले हैं!!

 

है वहदत के दरिया में वहदत ही वहदत!

ये दिल से दुई को मिटा कर चले हैं!!

 

ना था हम को मालूम इस्लाम क्या है!

वो दीने मोहम्मद बता कर चले हैं!!

 

ये मन्सूर हैं और कभी शम्स व सरमद्!

फना और बका ये दिखा कर चले हैं!!

 

नहीं तोड़ते दिल किसी का ये हरगिज!

ये दिल को भी काबा बनाकर चले हैं!!

 

कज़ा जितनी हम से हुई थी अये दावर!

नमाजों को हम वो अदा कर चले है!!

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