111. तमन्ना रंग लाई

 

 

हमारी बेबसी पर क्यों भला तक़दीर रोती है

गले को काट कर अपने ये क्यों शमशीर रोती है

 

हमारे हम नहीं अब यार शामिल हो गया हम में

हक़ीक़त रंग लाते देख कर ताबीर रोती है

 

ग़मों के आशियानों में ख़ताओं से बचे हम हैं

हमारी पारसाई देख कर तख़्सीर रोती है

 

इलाज इश्क़ के ख़ातिर मसीहा से भी मिल आए

दवा कुछ रंग न लाई तो अब तासीर रोती है

 

कहीं भी घर नहीं मिलता अजब हूँ बे सर-ओ-सामान

ऐ रहमत कुछ करम फ़रमा तेरी जागीर रोती है

 

तमन्ना रंग लाई थी हुआ दीदार सजदे में

ख़ुदा को देख कर क्यों अब मेरी तस्वीर रोती है

 

मोहब्बत ही मोहब्बत में फ़ना सरूर हुआ आख़िर

ये अपनी दास्तां रखते हुए तहरीर रोती है

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