109. हुव्लकुल

 

 

गुज़री है कैसे रात सहर देख रही है

कानों ने जो सुना था नज़र देख रही है

 

फ़रियाद हो ऐसी कि वो मंज़ूर नज़र हो

तासीर दुआओं का असर देख रही है

 

एक ख़्वाब-ए-जुनून और है एक ख़्वाब-ए-हक़ीक़त

ताबीर तो दोनों की मगर देख रही है

 

मज़लूम पे नाहक़ कभी तज़वीक न करना

आला तो ख़ुदाई का अमर देख रही है

 

बुज़दिल की दिलेरों से बहुत दूर है मंज़िल

हिम्मत तो वो आहनी जिगर देख रही है

 

सजदे का मज़ा जब है कोई सामने हो तब

क़ुदरत तो ये सजदों का सफ़र देख रही है

 

दावर का सुख़न अहल-ए-सुख़न को है करामत

इन सब की नज़र मेरा हुनर देख रही है

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