दीद बाजों की महफिल में आजाइए!
आप की एक कमी है चले आइए!!
यूँ ही कबतक तरस्ते रहेंगे यहाँ!
आप के गम् के मारे ये जायें कहाँ!
अब नज़र में नहीं है कोई आसताँ!
आने जाने की जहमत् ये फरमाइये!!
झाड फूलों के हैं गुल नहीं हैं मगर!
गुल भी गर उन में हैं तो नहीं हैं समर!
सूख जाये ना कादर कहीं ये शजर!
हम गरीबों पे इतना तरस खाइए!!
अबतो किश्ती के मल्लाह तुम मेहरबाँ!
नाखुदा भी तुम्हीं और तुम्हीं कारवाँ!
डूब जाये न कश्ती भंवर में यहाँ!
इस सफीने को कादर बचा जाईए!!
आप आयें तो बन जाये बिगडी मेरी!
जां’ब-ल्ब जितने हैं होंगे जिन्दा सभी!
हम पे हो जायेंगी फिर निगाहे नबी!
कादरे पाक तशरीफ ले आईए!!
हश्र में जब रहूँगा अकेला वहाँ!
आप हो जायेंगे जिस घड़ी बस अयाँ!
अये रफीक आका तुम हो मेरे मेहरबाँ!
अब करम अपने दावर पे फरमाईये!!
(दीद बाजों में दीदार दावर मिला
अपने मन् के चमन् में वो गोहर मिला)