किसी से मिलने की अब दिलमें आरजू भी नहीं!
मिले जो आप तो औरों की जुस्तजू भी नहीं!!
मेरे ही सजदों ने तुझ को खुदा बनाया है!
तेरी नज़र में अगर मैं नहीं तो तू भी नहीं!!
जुनूं के वास्ते लाजिम है चाक दामानी!
गरेबाँ चाक को अब हाजबे रफू भी नहीं!!
नमाजे इश्क अदा करना फर्ज अव्वल है!
मेरा वजूद अजल ही से बेवजू भी नहीं!!
उठा दे आके तू अन्त अना का अब परदा!
ये कायनात् में मैं भी नहीं तो तू भी नहीं!!
तेरी निगाह को क्या होगया है अये साकी!
सहर का वक्त है और बादये – सुबो भी नहीं!!
तसव्वरात भी मुर्शद का एक इबादत है!
ये किस ने कह दिया दावर के रूबरू भी नहीं!!