पढ़के खुरान मानी को समझा नहीं दूसरों को पढ़ाने से क्या फ़ायदा
पहले खुद दरस ले और मानी समझ उल्टा मतलब बताने से क्या फ़ायदा
फ़र्क़ मन ‘अरफ़ा में और क़द ‘अरफ़ा में कितना है तुझको मालूम शायद नहीं
नह्नु अकरब को पहले ज़रा जान ले राइका सर झुकाने से क्या फ़ायदा
हरकतों की इबादत में गुम हो गया अपनी हस्ती में क्या क्या है समझा नहीं
तेरे दिल का तुझी को पता ही नहीं सर पे खुरान उठाने से क्या फ़ायदा
तू समझता है माबूद जब एक है एक ही होगा दर दूसरा फिर कहाँ
दिल के खाने में मौजूद जब है ख़ुदा फिर तू काबे को जाने से क्या फ़ायदा
थको ज़ाहिद मुबारक हो मस्जिद तेरी मेरे दिल ही मौजूद है मेरा रब
जिन नमाज़ों में रब की न मेराज हो वो नमाज़ें पढ़ाने से क्या फ़ायदा
मैं निगाहों से अपनी पिला दूँ जिसे ज़िंदगी भर उसे होश आता नहीं
मेरी नज़रों से पी कर जो बा होश है उसको फिर से पिलाने से क्या फ़ायदा
जब मज़ा है कि दावर भी हो सामने सारे दावर को जी भरकर सजदे करो
रोशनी दूसरों को न जिस से मिले ऐसी शमा जलाने से क्या फ़ायदा